Wednesday, February 27, 2013

tanu thadani satsang 27 .0 2 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 27 .0 2 .2 0 1 3,

अगर  हमारे  जीवन    का  लक्ष्य  केवल  ईश्वर  प्रप्ति   होगा  तो  हम  सदैव  निराश  ही  रहेंगे , खुद   को  असफल  ही  मानेगे  ! ईश्वर  प्राप्ति  के  जो  तरीके  हम  अपनाते  हैं  उससे  हमारी  सृजनात्मकता  प्रभावित  होती  है ! जैसा  मैंने  पहले  भी  कहा  है ईश्वर   से  मिलने  के लिए जरुरी  होगा कि  हम  स्वयं  ईश्वर  बने   ना कि    भक्त ! भक्त  बनने  के  पीछे  तो  हमारी  मंशा  मात्र   ये होती  है  कि सभी  लोग  आपको  नेक  इंसान  के रूप  में  पहचाने  , क्यों  कि   आप  ईश्वर  भक्त  हैं  इसलिये  आप  गलत  नहीं  कर  सकते  ! इसी  तर्क  की  आड़  में  सभी  धर्मो  में  कई- कई     मुखोटेधारी   भक्तो  की जमात बन चुकी  है अत: आप ईश्वर   भक्त  है  इसलिये  आप  नेक  इंसान   होंगे  ये  धारणा  बिलकुल  विश्वसनीय  नहीं  रह   गई है  ! फिर   क्यों   न   सुखी  होने  और  सफल  होने  का  नुस्खा  ईश्वर -प्राप्ति  से  हट  कर  केवल नेक  इंसान  होने   को  बनाया  जाए !एक   अच्छा  नेक  मानव  जीवन  व्यतीत  कर के  गुजर   जाना  भी  तो  एक  सफल  और  सुखी   जीवन  का  मापदंड होता  है !     

Saturday, February 23, 2013

tanu thadani satsang 23 .0 2 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 23 .0 2 .2 0 1 3.

हमें  छोडनी  होगी  परमात्मा  से  मिलने की  ललक , हमें  छोडनी  होगी  परमात्मा  से  मिलने  की  जिद ! ये   तो  निश्चित   है  कि  परमात्मा  से   मिलन   के  लिये  स्वयं   को परमात्मा  बनाना   ही  पड़ेगा ! पर  कैसे  बनेगे  हम  परमात्मा  ?  ये  केवल  विचारणीय  ही  नहीं  असम्भव   सा  कार्य  है ! 
    प्रश्न  ये   भी  है  कि  हम  अंततः  ईश्वर  से  मिलने   की  चाह  रखते  ही  क्यूँ  हैं ? हमारा  लक्ष्य  ईश्वर  ही  क्यों    है  ??

Friday, February 22, 2013

tanu thadani satsang 22 .0 2 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 22 .0 2 .2 0 1 3

 हमें  परमात्मा  से   मिलने   के  लिये   क्या  करना  चाहिये ? क्या  भक्त  बनना  चाहिये   या   नेक  इंसान  बनना  चाहिए  अथवा   कुछ  ऐसा   करना  चाहिये  जिससे  ईश्वर  स्वयं   प्रशन्न    हो कर  हमसे   आ  मिले !
जी  नहीं  ;   हमें  तो  ईश्वर    से    मिलने    के  लिये  स्वयं  ईश्वर  ही   बनना  होगा   क्यों  कि पानी  से  केवल पानी   का  ही  मेल  हो  सकता  है  तेल  का  नहीं . आग  से  केवल  आग  का  ही  मिलन  हो  सकता  है . आग  से  पानी  का  मिलन  नहीं   होता . सज्जनों  से  मेल  के  लिये  स्वयं    को भी सज्जन  बनाना  ही  होगा  अन्यथा   कोई सज्जन  कतई  हमसे  नहीं  मिलेगा ! ठीक   उसी प्रकार  परमात्मा  से  मिलने  के  लिए  स्वयं  को  परमात्मा   बनाना  चाहिये   ना  कि  भक्त !   हम  स्वयं  परमात्मा  बनेगे  ,  मगर  कैसे ? किस  प्रयत्न  से ?  क्या  कोई   जवाब है   आप मित्रों  के  पास  ?