हमें छोडनी होगी परमात्मा से मिलने की ललक , हमें छोडनी होगी परमात्मा से मिलने की जिद ! ये तो निश्चित है कि परमात्मा से मिलन के लिये स्वयं को परमात्मा बनाना ही पड़ेगा ! पर कैसे बनेगे हम परमात्मा ? ये केवल विचारणीय ही नहीं असम्भव सा कार्य है !
प्रश्न ये भी है कि हम अंततः ईश्वर से मिलने की चाह रखते ही क्यूँ हैं ? हमारा लक्ष्य ईश्वर ही क्यों है ??
प्रश्न ये भी है कि हम अंततः ईश्वर से मिलने की चाह रखते ही क्यूँ हैं ? हमारा लक्ष्य ईश्वर ही क्यों है ??
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