संवेदनशीलता ईश्वर द्वारा प्रदत्त एक नायाब तोहफा है, अगर आप किसी की संवेदनशीलता का मजाक बनाते हैं तो यकीन मानिये कि ईश्वर ने गलती से आपको इंसान बना दिया !
tanu thadani"s satsang
Wednesday, September 16, 2020
Sunday, July 3, 2016
इंसान बनो
बनाए गए जितने भी धर्म हैं सभी अपने प्रसार के लिये और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिये हिंसा को जायज़ ठहराते है ! केवल इंसानियत ही प्राकृतिक धर्म है इसलिए केवल इंसान बन के रहो ! धर्मों के प्रवर्तकों ने पहले इंसानियत छोड़ी होगी तभी धर्म बनाया होगा वरना इंसानियत धर्म को मानने के बाद दूसरे किसी धर्म को मानने की आवश्यकता ही क्या है??
Sunday, November 30, 2014
tanuthadanisatsang30.11.14 तनु थदानी का सतसंग 30.11.14
नास्तिक बड़े ही सरल होते हैं मगर बड़ा ही कठिन है नास्तिक होना ! जंजीरों में बंधे पड़े रहने की सदियों से आदत हो गयी है , अब तो लगता है जंजीरों के अलावा जिंदगी में कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है !
बड़ा कठिन है जंजीरों को तोड़ना , उनसे मुक्ति पाना ! जिसने भी जंजीरों से खुद को मुक्त कर लिया वो एकदम सरल हो गया , पचड़ों से मुक्त हो गया कि मेरा भगवान बड़ा है , मेरे भगवान के विचार श्रेष्ठतम हैं ! श्रेष्ठतम की लड़ाई से मुक्त वो सर्वश्रेष्ठ बन जाता है , और भरपूर जिंदगी जीता है , वास्तविक जीवन जीता है !
रजनीश से बनते ओशो सिद्धार्थ से बनते बुद्ध जैसे तमाम विचारक इससे मुक्ति पाने का संदेश दे दे कर चले गयें ! लोग कुछ पल को नास्तिक बने फिर उनके जाने के बाद उनको ही भगवान बना कर पूजने लगे , फिर बंध गयें जंजीरों से !
मेरा आग्रह है आप एक बार में नास्तिक मत बनो ! ना नास्तिकता के पक्ष में तर्क कुतर्क करो ! रोज एक दो घंटों के लिये नास्तिक बनो फिर धीरे धीरे समय बढ़ाओ! धीरे धीरे खुद ही जंजीरों से मुक्त हो कर सरल हो जाओगे !
मत जाओ किसी ओशो या बुद्ध की शरण में ! नास्तिक होने कि एक ही शर्त व पहचान है सरल होना !
नास्तिक होने का मतलब आस्तिकों के विपरीत जाना नहीं बल्कि खुद को सरल बनाना मात्र है , जहाँ किसी का विरोध नहीं केवल जीवन है , उमंग है , शांति है , किसी भी मान्यता को ले कर झगड़ा या दंभ नहीं है !
अगर भगवान को मानने की आदत या मजबूरी है तो प्रकृति को भगवान बनाओ जो हमें हवा पानी रौशनी जीवन देती है ! खुद को भगवान बनाओ और मृत हो रही प्रकृति को जीवन प्रदान करो !
बड़ा कठिन है जंजीरों को तोड़ना , उनसे मुक्ति पाना ! जिसने भी जंजीरों से खुद को मुक्त कर लिया वो एकदम सरल हो गया , पचड़ों से मुक्त हो गया कि मेरा भगवान बड़ा है , मेरे भगवान के विचार श्रेष्ठतम हैं ! श्रेष्ठतम की लड़ाई से मुक्त वो सर्वश्रेष्ठ बन जाता है , और भरपूर जिंदगी जीता है , वास्तविक जीवन जीता है !
रजनीश से बनते ओशो सिद्धार्थ से बनते बुद्ध जैसे तमाम विचारक इससे मुक्ति पाने का संदेश दे दे कर चले गयें ! लोग कुछ पल को नास्तिक बने फिर उनके जाने के बाद उनको ही भगवान बना कर पूजने लगे , फिर बंध गयें जंजीरों से !
मेरा आग्रह है आप एक बार में नास्तिक मत बनो ! ना नास्तिकता के पक्ष में तर्क कुतर्क करो ! रोज एक दो घंटों के लिये नास्तिक बनो फिर धीरे धीरे समय बढ़ाओ! धीरे धीरे खुद ही जंजीरों से मुक्त हो कर सरल हो जाओगे !
मत जाओ किसी ओशो या बुद्ध की शरण में ! नास्तिक होने कि एक ही शर्त व पहचान है सरल होना !
नास्तिक होने का मतलब आस्तिकों के विपरीत जाना नहीं बल्कि खुद को सरल बनाना मात्र है , जहाँ किसी का विरोध नहीं केवल जीवन है , उमंग है , शांति है , किसी भी मान्यता को ले कर झगड़ा या दंभ नहीं है !
अगर भगवान को मानने की आदत या मजबूरी है तो प्रकृति को भगवान बनाओ जो हमें हवा पानी रौशनी जीवन देती है ! खुद को भगवान बनाओ और मृत हो रही प्रकृति को जीवन प्रदान करो !
Saturday, November 22, 2014
tanu thadani satsang 22.11.2014 तनु थदानी
हम मज़हब से दूर क्यों नहीं जा सकते ? जब तक धर्म मज़हब के नशे से हम खुद को मुक्त न कर लें तब तक न हम खुद शांति से रह पायेंगे न दुनियां को शांति से रहने देंगे !
उस अलौकिक शक्ति ने कोई धर्म नहीं बनाया ! उसने बनाये इंसान और जानवर, उसने बनाये नर और मादा , उसने बनाई खूबसूरत सी प्रकृति हम नर मादा इंसान जानवरों पंक्षियों के लिये ! हम इंसानों ने धरती पर लकीरें खींच कर देश बनाये , दिलों पर लकीरें खींच कर धर्म बनाये फिर अपने अपने देश अपने अपने धर्म की श्रेष्ठता मनवाने के लिये हमेशा मार काट करते रहें हैं , सिलसिला आज तक जारी है ! अगर हम गीता बाईबल कुरान ईश्वर अल्लाह सब को परे कर केवल प्रकृति की पूजा करें प्रकृति को सम्मान दें संरक्षित रखें तो सारे झगड़े व आडम्बर ही खत्म हो जायेंगे !
उस अलौकिक शक्ति ने कोई धर्म नहीं बनाया ! उसने बनाये इंसान और जानवर, उसने बनाये नर और मादा , उसने बनाई खूबसूरत सी प्रकृति हम नर मादा इंसान जानवरों पंक्षियों के लिये ! हम इंसानों ने धरती पर लकीरें खींच कर देश बनाये , दिलों पर लकीरें खींच कर धर्म बनाये फिर अपने अपने देश अपने अपने धर्म की श्रेष्ठता मनवाने के लिये हमेशा मार काट करते रहें हैं , सिलसिला आज तक जारी है ! अगर हम गीता बाईबल कुरान ईश्वर अल्लाह सब को परे कर केवल प्रकृति की पूजा करें प्रकृति को सम्मान दें संरक्षित रखें तो सारे झगड़े व आडम्बर ही खत्म हो जायेंगे !
Saturday, March 23, 2013
tanu thadani satsang 24 .0 3 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 24 .0 3 .2 0 13.
हमें ख़ुशी कहाँ से मिलती है ? बाहर से या खुद अपने अन्दर से ?? ज्ञानी कहतें हैं ख़ुशी अपने अन्दर से मिलती है मगर मेरा मानना है ख़ुशी हमारे भीतर होती ही नहीं है ना ही हम अपने अन्दर ख़ुशी का संचय कर पाते हैं ! जिस चुटकुले को सुन कर हम जोर से हंस पड़ते हैं , खुश होते हैं , बार- बार उसी चुटकुले को सुनने पर हम ना तो हंस पाते हैं ना आनंदित हो पाते हैं ! हम मानव ख़ुशी का संचय कर पाने के योग्य हैं ही नहीं !
प्रश्न है कि अगर बाहर से ख़ुशी मिलेगी तो कहाँ से ? अक्सर हम बाहर से मिलने वाली ख़ुशी को अछूत मानते हैं ! मगर सच यही है कि हम केवल बाहरी माध्यमो से ही खुद को खुश रख सकते हैं ! अलग- अलग लोगों के लिये ख़ुशी की परिभाषा भी अलग-अलग होती है ! कोई भौतिक सुखों से खुश रहता है तो कोई अध्यात्मिक सुखों से खुश रहता है ! ख़ुशी के मामले में हम सभी पूरी उम्र बच्चे की तरह व्यवहार करते हैं ! भौतिक सुखों का भोग कर खुश रहने वाला भी कभी - कभी आध्यात्मिक सुखों से ख़ुशी पाता है आनंदित होता है पुन : भौतिक सुखों की तरफ लौट जाता है उसी तरह आध्यात्मिक सुखों से खुश रहने वाला भौतिक सुखो का भी उपयोग अपनी ख़ुशी के लिये यदाकदा करता रहता है ! अंततः हमारा मकसद जो खुश रहने का होता है हम बाहरी माध्यमों से ही उसकी पूर्ति करते हैं ! सत्संग आश्रमों में भी भीषण गर्मियों में तब तक सत्संग करने में आनंद नहीं आता जब तक कूलर या एसी या पंखे ना चला लें !हमें आध्यात्मिक सुखों के लिये भी भौतिक सुखों की वैशाखी चाहिये और इसमें गलत कुछ भी नहीं है ! शारीरिक सुख हो या मानसिक सुख , हमें ख़ुशी दोनों से ही मिलती है अत: किसी की भी उपेक्षा कर हम खुश नहीं रह पायेंगे ! दरअसल ईश्वर ने हमें केवल सुख भोगने के लिए और खुश रहने के लिये ही अपनी बनायीं इस सुन्दर प्रकृति में भेजा है ! हम अगर दुखी हो कर जीवन गुजारते हैं तो हम संत - महात्मा या धनी होने के बावजूद जीवन में असफल ही माने जायेंगे !
Friday, March 22, 2013
tanu thadani satsang 22 .0 3 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 22 .0 3 .2 0 13.
शाकाहारी मानव पूरे गर्व के साथ बताता है कि वो शाकाहारी है और ईश्वर की सत्ता और सन्देश को मानता है ! मांसाहार न कर के वो जीवों पर दया और खुद को दयालु प्रदर्शित करता है और साथ में ईश्वर को दयालु बता कर खुद को उसके समकक्ष और सच्चा अनुयायी प्रायोजित करता है ! दूसरी तरफ मांसाहारी भी गर्व से खुद को ईश्वर की इच्छाओं का पालन करने वाला घोषित करता है ! माँसाहारी मानव के तर्कानुसार ईश्वर ने मानव को धरती पर जन्म देने के पश्चात केवल मांसाहार की प्रेरणा दी थी अतः मांसाहार करना ईश्वर की इच्छा का आदर करना है !
दोनों के तर्कों में ये तथ्य उलझ गया है कि क्या उचित है मानव के लिये ! मांसाहारी जीवन या शाकाहारी जीवन ? एक प्रश्न ये है कि क्या ईश्वर वास्तव में दयालु है ? मुझे तो एक भी प्रमाण नहीं मिलता कि जिससे साबित हो कि ईश्वर दयालु है ! अगर ईश्वर दयालु होता तो ये जन्म- मरण का चक्र खत्म कर देता , ना तो भूख बनाता ना भूख की पूर्ति के लिये पूरी उम्र भटकाता और ना ही हमें भावनाओं और संवेदनाओं के च्क्र्व्य्ह में फंसाता ! ईश्वर एक सधा हुआ खिलाड़ी है ! जिस तरह हम कागज़ पर आड़े - तिरछे चित्र बना कर मिटाते हैं , फाड़ते हैं फिर बनाते हैं , बिगाड़ते हैं बिना किसी ऐसी भावना से कि उन चित्रों को तकलीफ हो रही है बिलकुल ईश्वर भी हमारे साथ यही करता है !
हमें अगर जीवन का आनंद लेना है तो हमें शाकाहारी या मांसाहारी होने के दंभ से खुद को मुक्त करना होगा ! शाकाहारी भी दही के द्वारा जीवित बैक्ट्रीया जीव ग्रहण करते है , पानी द्वारा भी करोडो किस्म के जीवाणु ग्रहण करते हैं और माँसाहारी भी केवल मांस ही नहीं खाते फल- सब्जियां भी खाते हैं ! हमारे खान - पान के प्रति ईश्वर ने कोई भी सन्देश नहीं दिया है अत: मानव शरीर मिला है तो निःसंकोच इस शरीर की जो शक्ति हो जो इच्छा हो वो खाये और धारण करे मगर खुश रहे ! हम ना तो किसी की मौत का कारण हैं ना कारक ! हमारा जन्म इस धरती पर केवल ख़ुशी से जीवन जीने के लिये हुआ है और खुश रहना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है !
दोनों के तर्कों में ये तथ्य उलझ गया है कि क्या उचित है मानव के लिये ! मांसाहारी जीवन या शाकाहारी जीवन ? एक प्रश्न ये है कि क्या ईश्वर वास्तव में दयालु है ? मुझे तो एक भी प्रमाण नहीं मिलता कि जिससे साबित हो कि ईश्वर दयालु है ! अगर ईश्वर दयालु होता तो ये जन्म- मरण का चक्र खत्म कर देता , ना तो भूख बनाता ना भूख की पूर्ति के लिये पूरी उम्र भटकाता और ना ही हमें भावनाओं और संवेदनाओं के च्क्र्व्य्ह में फंसाता ! ईश्वर एक सधा हुआ खिलाड़ी है ! जिस तरह हम कागज़ पर आड़े - तिरछे चित्र बना कर मिटाते हैं , फाड़ते हैं फिर बनाते हैं , बिगाड़ते हैं बिना किसी ऐसी भावना से कि उन चित्रों को तकलीफ हो रही है बिलकुल ईश्वर भी हमारे साथ यही करता है !
हमें अगर जीवन का आनंद लेना है तो हमें शाकाहारी या मांसाहारी होने के दंभ से खुद को मुक्त करना होगा ! शाकाहारी भी दही के द्वारा जीवित बैक्ट्रीया जीव ग्रहण करते है , पानी द्वारा भी करोडो किस्म के जीवाणु ग्रहण करते हैं और माँसाहारी भी केवल मांस ही नहीं खाते फल- सब्जियां भी खाते हैं ! हमारे खान - पान के प्रति ईश्वर ने कोई भी सन्देश नहीं दिया है अत: मानव शरीर मिला है तो निःसंकोच इस शरीर की जो शक्ति हो जो इच्छा हो वो खाये और धारण करे मगर खुश रहे ! हम ना तो किसी की मौत का कारण हैं ना कारक ! हमारा जन्म इस धरती पर केवल ख़ुशी से जीवन जीने के लिये हुआ है और खुश रहना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है !
Friday, March 15, 2013
tanu thadani satsang 16 .0 3 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 16 .0 3 .2013.
हमारा धार्मिक होना हमारे ईश्वर के प्रति आदर का नहीं बल्कि अनादर का परिचायक है !हमारे धार्मिक होने के पीछे की मंशा क्या होती है ? ईश्वर के अस्तित्व को मानना या ईश्वर के अस्तित्व को सबो से मनवाना ? दरअसल धार्मिक होने के पीछे हमारा मकसद खुद को जैसा हम चाहते हैं वैसा सिद्ध करना होता है !
ईश्वर ने कोई धर्म नहीं बनाया , हम मानव ने अपनी-अपनी सुविधाओं के अनुसार कई -कई धर्म बना कर ईश्वर के निकटतम होने का ढोंग किया और ढोंग कर के , दूसरों को भी करते देख ना तो शर्मिंदा होते हैं ना ही खुद को गलत मानते हैं !
कोई भी धर्म या धार्मिक क्रिया - कलाप हमें जीवन की ख़ुशी नहीं देता और ना ही किसी धर्म में ऐसी क्षमता ही है कि वो सभी मानने वालों को जीवनपर्यन्त खुश रख सके ! धर्म का इस्तेमाल केवल मानव को डराने का साधन है और यही सत्य है !
जो किसी भी धर्म को नहीं मानता है वो अधार्मिक घोषित होता है यानी ईश्वर को न मानने वाला ! ईश्वर के प्रति निष्ठा रखने वाला तब तक ईश्वर के प्रति खुद को निष्ठांवान सिद्ध नहीं कर पाता जब तक वो किसी धर्म से नहीं जुड़ता है ! इसी विडंबना के कारण हम मानव धार्मिक और अधार्मिक रूपों में बंटे हैं !
ईश्वर की पूजा के प्रति तथस्ठ रह कर जीवन व्यापन करना हमारी मानव सभ्यता का अंग नहीं माना जाता ! क्या ये उचित है ? अगर पूजा करना और गीतों के माध्यम से ईश्वर का गुणगान करना ईश्वर को धन्यवाद देने का तरीका है तो फिर हम इस चापलूसी भरे तरीके से अलग कुछ नये तरीके से ईश्वर को धन्यवाद देने का साहस क्यों नहीं करते ? वो तरीका जनसंख्या के सैलाब को नियंत्रित करने के साथ ईश्वर द्वारा प्रदत प्रकृति के उपहार को सुरक्षित और संरक्षित रखना भी तो हो सकता है ! क्या धर्म से परे प्रकृति को सम्मान दे कर हम खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित साबित नहीं कर सकतें ??
ईश्वर ने कोई धर्म नहीं बनाया , हम मानव ने अपनी-अपनी सुविधाओं के अनुसार कई -कई धर्म बना कर ईश्वर के निकटतम होने का ढोंग किया और ढोंग कर के , दूसरों को भी करते देख ना तो शर्मिंदा होते हैं ना ही खुद को गलत मानते हैं !
कोई भी धर्म या धार्मिक क्रिया - कलाप हमें जीवन की ख़ुशी नहीं देता और ना ही किसी धर्म में ऐसी क्षमता ही है कि वो सभी मानने वालों को जीवनपर्यन्त खुश रख सके ! धर्म का इस्तेमाल केवल मानव को डराने का साधन है और यही सत्य है !
जो किसी भी धर्म को नहीं मानता है वो अधार्मिक घोषित होता है यानी ईश्वर को न मानने वाला ! ईश्वर के प्रति निष्ठा रखने वाला तब तक ईश्वर के प्रति खुद को निष्ठांवान सिद्ध नहीं कर पाता जब तक वो किसी धर्म से नहीं जुड़ता है ! इसी विडंबना के कारण हम मानव धार्मिक और अधार्मिक रूपों में बंटे हैं !
ईश्वर की पूजा के प्रति तथस्ठ रह कर जीवन व्यापन करना हमारी मानव सभ्यता का अंग नहीं माना जाता ! क्या ये उचित है ? अगर पूजा करना और गीतों के माध्यम से ईश्वर का गुणगान करना ईश्वर को धन्यवाद देने का तरीका है तो फिर हम इस चापलूसी भरे तरीके से अलग कुछ नये तरीके से ईश्वर को धन्यवाद देने का साहस क्यों नहीं करते ? वो तरीका जनसंख्या के सैलाब को नियंत्रित करने के साथ ईश्वर द्वारा प्रदत प्रकृति के उपहार को सुरक्षित और संरक्षित रखना भी तो हो सकता है ! क्या धर्म से परे प्रकृति को सम्मान दे कर हम खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित साबित नहीं कर सकतें ??
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