हमारा धार्मिक होना हमारे ईश्वर के प्रति आदर का नहीं बल्कि अनादर का परिचायक है !हमारे धार्मिक होने के पीछे की मंशा क्या होती है ? ईश्वर के अस्तित्व को मानना या ईश्वर के अस्तित्व को सबो से मनवाना ? दरअसल धार्मिक होने के पीछे हमारा मकसद खुद को जैसा हम चाहते हैं वैसा सिद्ध करना होता है !
ईश्वर ने कोई धर्म नहीं बनाया , हम मानव ने अपनी-अपनी सुविधाओं के अनुसार कई -कई धर्म बना कर ईश्वर के निकटतम होने का ढोंग किया और ढोंग कर के , दूसरों को भी करते देख ना तो शर्मिंदा होते हैं ना ही खुद को गलत मानते हैं !
कोई भी धर्म या धार्मिक क्रिया - कलाप हमें जीवन की ख़ुशी नहीं देता और ना ही किसी धर्म में ऐसी क्षमता ही है कि वो सभी मानने वालों को जीवनपर्यन्त खुश रख सके ! धर्म का इस्तेमाल केवल मानव को डराने का साधन है और यही सत्य है !
जो किसी भी धर्म को नहीं मानता है वो अधार्मिक घोषित होता है यानी ईश्वर को न मानने वाला ! ईश्वर के प्रति निष्ठा रखने वाला तब तक ईश्वर के प्रति खुद को निष्ठांवान सिद्ध नहीं कर पाता जब तक वो किसी धर्म से नहीं जुड़ता है ! इसी विडंबना के कारण हम मानव धार्मिक और अधार्मिक रूपों में बंटे हैं !
ईश्वर की पूजा के प्रति तथस्ठ रह कर जीवन व्यापन करना हमारी मानव सभ्यता का अंग नहीं माना जाता ! क्या ये उचित है ? अगर पूजा करना और गीतों के माध्यम से ईश्वर का गुणगान करना ईश्वर को धन्यवाद देने का तरीका है तो फिर हम इस चापलूसी भरे तरीके से अलग कुछ नये तरीके से ईश्वर को धन्यवाद देने का साहस क्यों नहीं करते ? वो तरीका जनसंख्या के सैलाब को नियंत्रित करने के साथ ईश्वर द्वारा प्रदत प्रकृति के उपहार को सुरक्षित और संरक्षित रखना भी तो हो सकता है ! क्या धर्म से परे प्रकृति को सम्मान दे कर हम खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित साबित नहीं कर सकतें ??
ईश्वर ने कोई धर्म नहीं बनाया , हम मानव ने अपनी-अपनी सुविधाओं के अनुसार कई -कई धर्म बना कर ईश्वर के निकटतम होने का ढोंग किया और ढोंग कर के , दूसरों को भी करते देख ना तो शर्मिंदा होते हैं ना ही खुद को गलत मानते हैं !
कोई भी धर्म या धार्मिक क्रिया - कलाप हमें जीवन की ख़ुशी नहीं देता और ना ही किसी धर्म में ऐसी क्षमता ही है कि वो सभी मानने वालों को जीवनपर्यन्त खुश रख सके ! धर्म का इस्तेमाल केवल मानव को डराने का साधन है और यही सत्य है !
जो किसी भी धर्म को नहीं मानता है वो अधार्मिक घोषित होता है यानी ईश्वर को न मानने वाला ! ईश्वर के प्रति निष्ठा रखने वाला तब तक ईश्वर के प्रति खुद को निष्ठांवान सिद्ध नहीं कर पाता जब तक वो किसी धर्म से नहीं जुड़ता है ! इसी विडंबना के कारण हम मानव धार्मिक और अधार्मिक रूपों में बंटे हैं !
ईश्वर की पूजा के प्रति तथस्ठ रह कर जीवन व्यापन करना हमारी मानव सभ्यता का अंग नहीं माना जाता ! क्या ये उचित है ? अगर पूजा करना और गीतों के माध्यम से ईश्वर का गुणगान करना ईश्वर को धन्यवाद देने का तरीका है तो फिर हम इस चापलूसी भरे तरीके से अलग कुछ नये तरीके से ईश्वर को धन्यवाद देने का साहस क्यों नहीं करते ? वो तरीका जनसंख्या के सैलाब को नियंत्रित करने के साथ ईश्वर द्वारा प्रदत प्रकृति के उपहार को सुरक्षित और संरक्षित रखना भी तो हो सकता है ! क्या धर्म से परे प्रकृति को सम्मान दे कर हम खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित साबित नहीं कर सकतें ??
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