शाकाहारी मानव पूरे गर्व के साथ बताता है कि वो शाकाहारी है और ईश्वर की सत्ता और सन्देश को मानता है ! मांसाहार न कर के वो जीवों पर दया और खुद को दयालु प्रदर्शित करता है और साथ में ईश्वर को दयालु बता कर खुद को उसके समकक्ष और सच्चा अनुयायी प्रायोजित करता है ! दूसरी तरफ मांसाहारी भी गर्व से खुद को ईश्वर की इच्छाओं का पालन करने वाला घोषित करता है ! माँसाहारी मानव के तर्कानुसार ईश्वर ने मानव को धरती पर जन्म देने के पश्चात केवल मांसाहार की प्रेरणा दी थी अतः मांसाहार करना ईश्वर की इच्छा का आदर करना है !
दोनों के तर्कों में ये तथ्य उलझ गया है कि क्या उचित है मानव के लिये ! मांसाहारी जीवन या शाकाहारी जीवन ? एक प्रश्न ये है कि क्या ईश्वर वास्तव में दयालु है ? मुझे तो एक भी प्रमाण नहीं मिलता कि जिससे साबित हो कि ईश्वर दयालु है ! अगर ईश्वर दयालु होता तो ये जन्म- मरण का चक्र खत्म कर देता , ना तो भूख बनाता ना भूख की पूर्ति के लिये पूरी उम्र भटकाता और ना ही हमें भावनाओं और संवेदनाओं के च्क्र्व्य्ह में फंसाता ! ईश्वर एक सधा हुआ खिलाड़ी है ! जिस तरह हम कागज़ पर आड़े - तिरछे चित्र बना कर मिटाते हैं , फाड़ते हैं फिर बनाते हैं , बिगाड़ते हैं बिना किसी ऐसी भावना से कि उन चित्रों को तकलीफ हो रही है बिलकुल ईश्वर भी हमारे साथ यही करता है !
हमें अगर जीवन का आनंद लेना है तो हमें शाकाहारी या मांसाहारी होने के दंभ से खुद को मुक्त करना होगा ! शाकाहारी भी दही के द्वारा जीवित बैक्ट्रीया जीव ग्रहण करते है , पानी द्वारा भी करोडो किस्म के जीवाणु ग्रहण करते हैं और माँसाहारी भी केवल मांस ही नहीं खाते फल- सब्जियां भी खाते हैं ! हमारे खान - पान के प्रति ईश्वर ने कोई भी सन्देश नहीं दिया है अत: मानव शरीर मिला है तो निःसंकोच इस शरीर की जो शक्ति हो जो इच्छा हो वो खाये और धारण करे मगर खुश रहे ! हम ना तो किसी की मौत का कारण हैं ना कारक ! हमारा जन्म इस धरती पर केवल ख़ुशी से जीवन जीने के लिये हुआ है और खुश रहना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है !
दोनों के तर्कों में ये तथ्य उलझ गया है कि क्या उचित है मानव के लिये ! मांसाहारी जीवन या शाकाहारी जीवन ? एक प्रश्न ये है कि क्या ईश्वर वास्तव में दयालु है ? मुझे तो एक भी प्रमाण नहीं मिलता कि जिससे साबित हो कि ईश्वर दयालु है ! अगर ईश्वर दयालु होता तो ये जन्म- मरण का चक्र खत्म कर देता , ना तो भूख बनाता ना भूख की पूर्ति के लिये पूरी उम्र भटकाता और ना ही हमें भावनाओं और संवेदनाओं के च्क्र्व्य्ह में फंसाता ! ईश्वर एक सधा हुआ खिलाड़ी है ! जिस तरह हम कागज़ पर आड़े - तिरछे चित्र बना कर मिटाते हैं , फाड़ते हैं फिर बनाते हैं , बिगाड़ते हैं बिना किसी ऐसी भावना से कि उन चित्रों को तकलीफ हो रही है बिलकुल ईश्वर भी हमारे साथ यही करता है !
हमें अगर जीवन का आनंद लेना है तो हमें शाकाहारी या मांसाहारी होने के दंभ से खुद को मुक्त करना होगा ! शाकाहारी भी दही के द्वारा जीवित बैक्ट्रीया जीव ग्रहण करते है , पानी द्वारा भी करोडो किस्म के जीवाणु ग्रहण करते हैं और माँसाहारी भी केवल मांस ही नहीं खाते फल- सब्जियां भी खाते हैं ! हमारे खान - पान के प्रति ईश्वर ने कोई भी सन्देश नहीं दिया है अत: मानव शरीर मिला है तो निःसंकोच इस शरीर की जो शक्ति हो जो इच्छा हो वो खाये और धारण करे मगर खुश रहे ! हम ना तो किसी की मौत का कारण हैं ना कारक ! हमारा जन्म इस धरती पर केवल ख़ुशी से जीवन जीने के लिये हुआ है और खुश रहना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है !
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