tanu thadani satsang 24 .0 3 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 24 .0 3 .2 0 13.
हमें ख़ुशी कहाँ से मिलती है ? बाहर से या खुद अपने अन्दर से ?? ज्ञानी कहतें हैं ख़ुशी अपने अन्दर से मिलती है मगर मेरा मानना है ख़ुशी हमारे भीतर होती ही नहीं है ना ही हम अपने अन्दर ख़ुशी का संचय कर पाते हैं ! जिस चुटकुले को सुन कर हम जोर से हंस पड़ते हैं , खुश होते हैं , बार- बार उसी चुटकुले को सुनने पर हम ना तो हंस पाते हैं ना आनंदित हो पाते हैं ! हम मानव ख़ुशी का संचय कर पाने के योग्य हैं ही नहीं !
प्रश्न है कि अगर बाहर से ख़ुशी मिलेगी तो कहाँ से ? अक्सर हम बाहर से मिलने वाली ख़ुशी को अछूत मानते हैं ! मगर सच यही है कि हम केवल बाहरी माध्यमो से ही खुद को खुश रख सकते हैं ! अलग- अलग लोगों के लिये ख़ुशी की परिभाषा भी अलग-अलग होती है ! कोई भौतिक सुखों से खुश रहता है तो कोई अध्यात्मिक सुखों से खुश रहता है ! ख़ुशी के मामले में हम सभी पूरी उम्र बच्चे की तरह व्यवहार करते हैं ! भौतिक सुखों का भोग कर खुश रहने वाला भी कभी - कभी आध्यात्मिक सुखों से ख़ुशी पाता है आनंदित होता है पुन : भौतिक सुखों की तरफ लौट जाता है उसी तरह आध्यात्मिक सुखों से खुश रहने वाला भौतिक सुखो का भी उपयोग अपनी ख़ुशी के लिये यदाकदा करता रहता है ! अंततः हमारा मकसद जो खुश रहने का होता है हम बाहरी माध्यमों से ही उसकी पूर्ति करते हैं ! सत्संग आश्रमों में भी भीषण गर्मियों में तब तक सत्संग करने में आनंद नहीं आता जब तक कूलर या एसी या पंखे ना चला लें !हमें आध्यात्मिक सुखों के लिये भी भौतिक सुखों की वैशाखी चाहिये और इसमें गलत कुछ भी नहीं है ! शारीरिक सुख हो या मानसिक सुख , हमें ख़ुशी दोनों से ही मिलती है अत: किसी की भी उपेक्षा कर हम खुश नहीं रह पायेंगे ! दरअसल ईश्वर ने हमें केवल सुख भोगने के लिए और खुश रहने के लिये ही अपनी बनायीं इस सुन्दर प्रकृति में भेजा है ! हम अगर दुखी हो कर जीवन गुजारते हैं तो हम संत - महात्मा या धनी होने के बावजूद जीवन में असफल ही माने जायेंगे !
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