Monday, March 11, 2013

tanu thadani satsang 10 .0 3 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 10 .0 3 .2 0 1 3,

हम  मानव जाति   लिए  ईश्वर   का  सन्देश क्या    है  ? क्या  अपेक्षा  है  परमपिता  परमेश्वर  की   हम  मानव से !

  संत   कहते  हैं  मानव   जीवन    मिला  है  इसे    केवल  ईश्वर- भक्ति  में  व्यतीत  करना  चाहिये! विद्वान् कहते  हैं  बड़े  भाग्य  से मानव शरीर   मिला  है   इसका उपयोग    भले  कार्यों में   करना  चाहिये  !

  क्यों  हम  अपना  सम्पूर्ण  जीवन  मात्र  पिता  की  स्तुति  में  नष्ट  करें ?  कोई पिता   भी  ऐसा   नहीं चाहेगा !

क्या  ईश्वर   अपनी  स्तुति  के  लिए   ही   हमें  जन्म   देता  है  ??

भले  कार्यों  की  परिभाषा  कौन   निश्चित   करेगा  ? ईश्वर  या  खुद  मानव ??

   हम मानव  खुद  को  इतना  समझदार   बना   डालने  के  बावजूद   ईश्वर  का  सन्देश   और  जीवन  को  जीने   के  तरीके  का   संकेत   समझ   नहीं  पाते  ! हम  उस  अंधे  की  तरह  समझदारी  दिखाते   हैं   जो  पूंछ  को  रस्सी  और  रस्सी  को  सांप  समझने    जैसा    करता  है  !

  ईश्वर   का   सन्देश  बिलकुल  स्पष्ट   है  कि   मानव   जीवन   मिला   है   और   मिली है  एक  खुशहाल  मस्त  प्रकृति - पेड़ -पहाड़ -नदियां -पक्षी -साग़र -फूलों  आदि   से  लबालब  ! बस  हम मानव  इन  प्राकृतिक  रचनाओं   का  आदर  करते  हुये   इनके  संग संग ख़ुशी-ख़ुशी  जीवन  व्यतीत  करें  और  जीवन   के समापन  तक  आनंदित  रहें ! अगर  कोई  बीता  हुआ  क्षण  व्यथित  कर  रहा  है   तो  उसे  भूल   जायें  और  आगे  बढ़े !
  आप   पूछेगें  कि भूतकाल  को  क्यों  और  कैसे  भूल  कर  आगे  बढ़े !  मेरा  मानना  है  ईश्वर  का  यही  सन्देश  है  कि  कल  जो  बीत   गया  अच्छा  या  बुरा  उसे भूल   जायें , आज  जो  हम  जी  रहें   हैं  उसे  आनंदमय  बनाये !  अगर    ईश्वर  ये  नहीं  चाहता  तो  व़ो  हमसे  पिछले  जन्म  की  स्मृति  क्यों  छीन  लेता ? पिछले  जन्म  की  स्मृतियाँ   इस  जन्म  में  नहीं  देने का प्रयोजन  ही  ईश्वर  का  हम  मानव  को  स्पष्ट  सन्देश  है  कि जो  बीत  जाता  है  उसे  भूल  कर  रोज  नया जीवन  जीये    तभी  हम  खुश  रह  पायेंगें  !  







   









Friday, March 8, 2013

tanu thadani satsang 08 .0 3 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 08 .0 3 .2 0 1 3,

हमारा  जन्म  आखिर  क्यूँ   हुआ  है  ? इस  प्रश्न     की गुत्थी  को  सुलझाते -सुलझाते   सभी  विचारक , सभी  संत  , सभी  समाजसेवी  दुनिया   से चले   गये  !  हाँ ,  जाते - जाते  अपनी- अपनी  व्याख्याये  छोड़  गये ! हर एक   को  मानव- जन्म    का मकसद  अलग  - अलग   लगा ! 
   मैं बड़ा  अचम्भित  हूँ  कि   इतना आसान   सा प्रश्न  कि   हमारा  जन्म  आखिर  क्यूँ   हुआ  है  को  हमारे विद्वजनों   ने  इतना  उलझा   दिया है  कि  हम  भ्रमित    हो गये  हैं ! हर एक  विचारक  की  कसौटी दूसरे  से भिन्न   है !  इसलिये  पूरी   मानव  जाति  उम्र  के  आखरी  पड़ाव  में बेहद  निराश  व  कुंठित  हो  जाती  है , सभी  को  ऐसा  लगता  है   कि जीवन   का  मकसद  पूरा   नहीं हुआ और  शरीर   साथ  नहीं   दे  रहा है , क्या  मैं   जीवन  में  असफल  रहा ?
    हम   मानव- जाति  वस्तुत :  जीवन   के   किसी  भी  क्षेत्र   में  अपने  सफल  होने  को  अपना  लक्ष्य  मान कर    जीवन   जीते  हैं  फिर   असफल  होने  पर  कुंठित    हो  जाते  हैं  और  सफल होने  पर  भी ऐसा   लगता  है  कि कुछ  और  भी    तो मैं   कर  सकता    था !  अत :  सफलता  और   असफलता  ही  हमारे  जीने  का  मापदंड  बन  जाता  है !
   आइये  मैं  आपको  बताता   हूँ  कि  हमारा  जन्म  आखिर  क्यूँ   हुआ ?
हमारा  जन्म इस  धरती  पर  मात्र  खुद  को  खुश  रखते  हुये  सबों  के   साथ  केवल  ख़ुशी से  समय  व्यतीत   करने  के  लिये   हुआ  है ! ईश्वर  का  मानव - जाति को  जन्म  देने  के  पीछे  इसके  अलावा  और    कोई प्रयोजन  नहीं   है !अपनी-अपनी  भावनाओं  को  व्यक्त  करने के लिये  अपनी-अपनी  भाषायें  विकसित  करने  की  क्षमता  और   परिवार  नामक  संस्था   बनाने  की   कला  दे  कर ईश्वर  ने  हमें  खुद  को  खुश  रखने  का  रास्ता  भी  दिखाया  ! हम  सब   ईश्वर  के  इस  संदेश   को  समझ  नहीं   पाने  के   कारण  पूरा   जीवन  दुखों में  व्यतीत  करते  हैं !  
     हमसे  बेहतर  पशु  व्  पंक्षी   ही  ईश्वर  के  सन्देश  से  को  समझ  पाये  हैं , जिन्होंने  ना  तो  कोई  धर्म  बनाया  ना सुखों  के  नकली  साधन  बनाये , आडम्बरों  से  दूर  पशु- पंक्षी  बिना  ताम-झाम  के , बिना प्रकृति  से  छेड़ - छाड़  किये  दुनियाँ  में  आते और  जाते  हैं  यही जीवन -शैली  ही  ईश्वर  का  सन्देश  है  !     







Wednesday, February 27, 2013

tanu thadani satsang 27 .0 2 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 27 .0 2 .2 0 1 3,

अगर  हमारे  जीवन    का  लक्ष्य  केवल  ईश्वर  प्रप्ति   होगा  तो  हम  सदैव  निराश  ही  रहेंगे , खुद   को  असफल  ही  मानेगे  ! ईश्वर  प्राप्ति  के  जो  तरीके  हम  अपनाते  हैं  उससे  हमारी  सृजनात्मकता  प्रभावित  होती  है ! जैसा  मैंने  पहले  भी  कहा  है ईश्वर   से  मिलने  के लिए जरुरी  होगा कि  हम  स्वयं  ईश्वर  बने   ना कि    भक्त ! भक्त  बनने  के  पीछे  तो  हमारी  मंशा  मात्र   ये होती  है  कि सभी  लोग  आपको  नेक  इंसान  के रूप  में  पहचाने  , क्यों  कि   आप  ईश्वर  भक्त  हैं  इसलिये  आप  गलत  नहीं  कर  सकते  ! इसी  तर्क  की  आड़  में  सभी  धर्मो  में  कई- कई     मुखोटेधारी   भक्तो  की जमात बन चुकी  है अत: आप ईश्वर   भक्त  है  इसलिये  आप  नेक  इंसान   होंगे  ये  धारणा  बिलकुल  विश्वसनीय  नहीं  रह   गई है  ! फिर   क्यों   न   सुखी  होने  और  सफल  होने  का  नुस्खा  ईश्वर -प्राप्ति  से  हट  कर  केवल नेक  इंसान  होने   को  बनाया  जाए !एक   अच्छा  नेक  मानव  जीवन  व्यतीत  कर के  गुजर   जाना  भी  तो  एक  सफल  और  सुखी   जीवन  का  मापदंड होता  है !     

Saturday, February 23, 2013

tanu thadani satsang 23 .0 2 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 23 .0 2 .2 0 1 3.

हमें  छोडनी  होगी  परमात्मा  से  मिलने की  ललक , हमें  छोडनी  होगी  परमात्मा  से  मिलने  की  जिद ! ये   तो  निश्चित   है  कि  परमात्मा  से   मिलन   के  लिये  स्वयं   को परमात्मा  बनाना   ही  पड़ेगा ! पर  कैसे  बनेगे  हम  परमात्मा  ?  ये  केवल  विचारणीय  ही  नहीं  असम्भव   सा  कार्य  है ! 
    प्रश्न  ये   भी  है  कि  हम  अंततः  ईश्वर  से  मिलने   की  चाह  रखते  ही  क्यूँ  हैं ? हमारा  लक्ष्य  ईश्वर  ही  क्यों    है  ??

Friday, February 22, 2013

tanu thadani satsang 22 .0 2 .2 0 1 3 तनु थदानी सत्संग 22 .0 2 .2 0 1 3

 हमें  परमात्मा  से   मिलने   के  लिये   क्या  करना  चाहिये ? क्या  भक्त  बनना  चाहिये   या   नेक  इंसान  बनना  चाहिए  अथवा   कुछ  ऐसा   करना  चाहिये  जिससे  ईश्वर  स्वयं   प्रशन्न    हो कर  हमसे   आ  मिले !
जी  नहीं  ;   हमें  तो  ईश्वर    से    मिलने    के  लिये  स्वयं  ईश्वर  ही   बनना  होगा   क्यों  कि पानी  से  केवल पानी   का  ही  मेल  हो  सकता  है  तेल  का  नहीं . आग  से  केवल  आग  का  ही  मिलन  हो  सकता  है . आग  से  पानी  का  मिलन  नहीं   होता . सज्जनों  से  मेल  के  लिये  स्वयं    को भी सज्जन  बनाना  ही  होगा  अन्यथा   कोई सज्जन  कतई  हमसे  नहीं  मिलेगा ! ठीक   उसी प्रकार  परमात्मा  से  मिलने  के  लिए  स्वयं  को  परमात्मा   बनाना  चाहिये   ना  कि  भक्त !   हम  स्वयं  परमात्मा  बनेगे  ,  मगर  कैसे ? किस  प्रयत्न  से ?  क्या  कोई   जवाब है   आप मित्रों  के  पास  ?